डीएसआर तकनीक से धान की खेती में पानी की 35% तक बचत, लागत में ₹14 हजार प्रति हेक्टेयर तक कमी संभव

Rashtriya Shikhar
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Using DSR technology in paddy cultivation can save up to 35% water and reduce costs by up to ₹14,000 per hectare IMAGE CREDIT TO एफएसआईआई

नई दिल्ली (शिखर समाचार) देश में बढ़ते जल संकट, कृषि लागत में वृद्धि और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच धान की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को तेजी से अपनाने की आवश्यकता बताई गई है। फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) ने मंगलवार को नई दिल्ली के एनएएससी कॉम्प्लेक्स में आयोजित एक सम्मेलन में कहा कि डीएसआर तकनीक अपनाने से पानी की खपत में लगभग 35 प्रतिशत तक कमी और खेती की लागत में लगभग 14 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक बचत संभव है।

भूजल पर बढ़ता दबाव, डीएसआर से मिल सकता है समाधान

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सस्टेनेबल और लाभकारी धान उत्पादन के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस विषय पर आयोजित सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य धान उत्पादक क्षेत्रों में डीएसआर तकनीक को बढ़ावा देने के अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा करना तथा इसके प्रसार के लिए रणनीति तैयार करना था।

एफएसआईआई के अध्यक्ष तथा सवाना सीड्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक अजय राणा ने कहा कि भारत में धान की खेती भूजल संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही है। उन्होंने बताया कि पंजाब में भूजल दोहन वार्षिक पुनर्भरण का लगभग 156 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जबकि हरियाणा में यह लगभग 137 प्रतिशत है। उन्होंने बताया कि एक किलोग्राम चावल उत्पादन के लिए करीब तीन हजार से पांच हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे धान सबसे अधिक पानी की खपत करने वाली फसलों में शामिल है। ऐसे में डीएसआर तकनीक जल संरक्षण के साथ-साथ खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मददगार साबित हो सकती है।

लागत और श्रम में कमी, खरपतवार प्रबंधन चुनौती

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अजय राणा ने कहा कि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण के साथ-साथ श्रम लागत को कम करने में भी सहायक है। हालांकि इस पद्धति में खरपतवार प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इसे दूर करने के लिए बीज उद्योग ने सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से हर्बिसाइड सहिष्णु तकनीक विकसित की है, जिससे किसान खरपतवारों को अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले खरीफ मौसम में लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में ड्रिल आधारित बुवाई के साथ हर्बिसाइड सहिष्णु धान की खेती की गई, जिसमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसका सबसे अधिक उपयोग देखा गया।

नीति समर्थन और नई तकनीकों से बढ़ेगा डीएसआर का विस्तार

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह ने कहा कि कई राज्यों में डीएसआर तकनीक अपनाने से सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि नई बीज तकनीकें, उन्नत फसल सुरक्षा उपाय और बेहतर कृषि पद्धतियां भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण के अध्यक्ष तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र ने कहा कि डीएसआर धान की खेती की दक्षता बढ़ाने और किसानों की लागत कम करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उनका अनुमान है कि भारत में धान के कुल क्षेत्रफल का 20 से 60 प्रतिशत हिस्सा कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार डीएसआर तकनीक में परिवर्तित किया जा सकता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने कहा कि धान भारत की खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन उत्पादन प्रणालियों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के अनुरूप विकसित करना होगा। सम्मेलन में मध्य प्रदेश के प्रगतिशील किसान मेहत लाल बिसेन ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि डीएसआर अपनाने से श्रम लागत और पानी की खपत में कमी आई है तथा धान की खेती की समग्र दक्षता में सुधार हुआ है। विशेषज्ञों ने कहा कि नीति समर्थन, आधुनिक बीज तकनीक, मशीनीकरण और प्रभावी प्रशिक्षण के माध्यम से डीएसआर तकनीक को देशभर में बढ़ावा दिया जा सकता है।

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