नई दिल्ली (शिखर समाचार)। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को केंद्र सरकार द्वारा सैद्धांतिक वन एवं पर्यावरण मंजूरी दिए जाने के बाद विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार और खनन समर्थक इसे ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं, जबकि पर्यावरण विशेषज्ञों, वन्यजीव संरक्षण संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय पर चिंता जताते हुए ओपन कास्ट खनन के बजाय अंडरग्राउंड माइनिंग को बेहतर विकल्प बताया है।
हसदेव अरण्य: देश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में शामिल
हसदेव-अरण्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिलों में फैला देश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में से एक है। लगभग 1.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह जंगल घनी जैव विविधता, वन्यजीवों और हाथियों के महत्वपूर्ण आवास के लिए जाना जाता है। इसे मध्य भारत का सबसे बड़ा सतत वन क्षेत्र भी माना जाता है। हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका भी इसी जंगल पर निर्भर है, जिसके चलते यहां प्रस्तावित खनन परियोजनाएं लंबे समय से विवाद और विरोध का विषय रही हैं।
केंद्र सरकार ने राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) को आवंटित केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए सैद्धांतिक वन स्वीकृति प्रदान की है। इस खदान से निकाले जाने वाले कोयले की आपूर्ति राजस्थान के ताप विद्युत संयंत्रों को की जाएगी। परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में वन भूमि के उपयोग की अनुमति दी गई है, जिससे हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होने और बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है।
ओपन कास्ट खनन बनाम अंडरग्राउंड माइनिंग पर बहस तेज
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भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में महानिदेशक रह चुके डॉ. वी.के. बहुगुणा ने कहा कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में भूमिगत खनन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके अनुसार सघन वन और समृद्ध जैव विविधता वाले इस क्षेत्र में ओपन कास्ट खनन से अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंडरग्राउंड माइनिंग में सतही वन क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षित रहता है, हाथी कॉरिडोर पर प्रभाव कम पड़ता है और स्थानीय समुदायों के विस्थापन की संभावना भी घटती है।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरण संरक्षण पर राष्ट्रीय बहस
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खनन समर्थकों का कहना है कि देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयला अभी भी एक महत्वपूर्ण संसाधन है और यह परियोजना राजस्थान के बिजली संयंत्रों के लिए आवश्यक है। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके लिए देश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।
पर्यावरणविदों के अनुसार हसदेव अरण्य केवल कोयले का भंडार नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर है। ऐसे में अंतिम मंजूरी से पहले विशेषज्ञों की राय, वन्यजीवों पर प्रभाव और स्थानीय समुदायों की चिंताओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
