—–राष्ट्रीय शिखर के समाचार संपादक आरव शर्मा को धमकी देने के मामले में कई सवाल अनुत्तरित
गाजियाबाद (शिखर समाचार)। राष्ट्रीय शिखर के समाचार संपादक आरव शर्मा को कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर जान से मारने की धमकी देने के मामले में गिरफ्तार अंशु प्रजापति के बयान के बाद जांच की गुत्थी और उलझती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल 13 अक्टूबर को भेजे गए ‘हेलो’ मैसेज को लेकर है। आरोपी ने इस संदेश को भेजने से इनकार किया है, जबकि मोबाइल नंबर से जुड़ी ट्रूकॉलर प्रोफाइल में अंशु प्रजापति के साथ धर्मेश वधैर का नाम भी सामने आने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर धर्मेश वधैर कौन है और इस पूरे प्रकरण में उसकी क्या भूमिका हो सकती है?
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, अंशु प्रजापति ने पूछताछ के दौरान पहले 13 अक्टूबर को भेजे गए ‘हेलो’ मैसेज से इनकार किया। बाद में उसने इस संदेश के लिए अपने दोस्त दीपक का नाम लिया। लेकिन पुलिस की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में उसके साथ रहने वाले दोस्तों के नाम अमित, अमर और सौरभ बताए गए हैं। इन नामों के बीच दीपक का नाम सामने नहीं आने से आरोपी के बयान को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, यह स्पष्ट होना अभी बाकी है कि दीपक नाम का कोई अन्य परिचित है या नहीं।
‘दीपक’ के नाम के पीछे कौन? धर्मेश वधैर पर उठ रहे सवाल
इस मामले में धर्मेश वधैर का नाम भी जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। दावा किया जा रहा है कि संबंधित मोबाइल नंबर की ट्रूकॉलर प्रोफाइल में धर्मेश वधैर का नाम दिखाई देता है। यदि यह जानकारी सही है, तो पुलिस के लिए यह पता लगाना जरूरी होगा कि नंबर का वास्तविक उपयोगकर्ता कौन था, सिम किसके नाम पर पंजीकृत है और अलग-अलग नामों का इस नंबर से क्या संबंध है।
क्या आरोपी जिस दीपक का नाम ले रहा है, उसकी पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की गई है? क्या दीपक और धर्मेश वधैर अलग-अलग व्यक्ति हैं या इस मामले में किसी नाम को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है? फिलहाल इन सवालों के जवाब उपलब्ध तथ्यों से निर्णायक रूप से नहीं दिए जा सकते। इनकी पुष्टि मोबाइल फोन के तकनीकी साक्ष्यों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, संदेशों के मूल डेटा और संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ के आधार पर ही हो सकती है।
लॉरेंस बिश्नोई के साथ कथित तस्वीर की भी हो जांच
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अन्य स्रोतों से मिली जानकारी में धर्मेश वधैर की कथित तस्वीर लॉरेंस बिश्नोई के साथ होने का दावा भी किया जा रहा है। हालांकि, तस्वीर की प्रामाणिकता, उसमें दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान और तस्वीर के संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि होना आवश्यक है। केवल किसी तस्वीर या सोशल मीडिया प्रोफाइल के आधार पर किसी व्यक्ति का गैंग से संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। फिर भी, यदि जांच एजेंसियों को इस संबंध में कोई विश्वसनीय डिजिटल साक्ष्य मिलता है, तो उसकी विधिवत जांच की जानी चाहिए।
18 अक्टूबर के वॉइस नोट को लेकर भी उठ सकते हैं सवाल
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इस प्रकरण में 13 अक्टूबर के ‘हेलो’ संदेश के अलावा 18 अक्टूबर को भेजे गए धमकी भरे वॉइस नोट की भी आवाज संबंधी जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि आरोपी 13 अक्टूबर के संदेश को भेजने से इनकार कर रहा है, तो पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बाद में भेजे गए वॉइस नोट वास्तव में उसी की आवाज में हैं या किसी अन्य व्यक्ति ने उसके नाम अथवा नंबर का इस्तेमाल किया था। इसका पता लगाने के लिए मूल ऑडियो की फॉरेंसिक जांच और जरूरत पड़ने पर आवाज के नमूनों का वैज्ञानिक मिलान कराया जा सकता है।

कम उम्र का आरोपी, लेकिन क्या पूरी साजिश का खुलासा हुआ?
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अंशु प्रजापति की उम्र लगभग 20 वर्ष बताई जा रही है। उसकी पृष्ठभूमि, संपर्कों और कथित धमकी के पीछे संभावित मकसद की जांच भी महत्वपूर्ण है। लेकिन कम उम्र, आर्थिक स्थिति या किसी क्षेत्र विशेष से संबंध के आधार पर किसी व्यक्ति को दूसरे मामलों के आरोपियों से जोड़ना उचित नहीं होगा। जांच का आधार ठोस साक्ष्य ही होने चाहिए।
राष्ट्रीय शिखर के समाचार संपादक आरव शर्मा को मिली धमकी के मामले में सबसे अहम सवाल अब भी यही है कि क्या गिरफ्तार आरोपी ही पूरे घटनाक्रम में शामिल है या इसके पीछे अन्य लोगों की भी कोई भूमिका है? पुलिस को 13 अक्टूबर के संदेश, 18 अक्टूबर के वॉइस नोट, मोबाइल नंबरों से जुड़ी डिजिटल पहचान और आरोपी के बताए संपर्कों की कड़ियों को जोड़कर जांच करनी होगी।

जब तक सभी संदिग्ध कड़ियों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक घटनाक्रम स्पष्ट नहीं होता, तब तक मामले के हर पहलू पर सवाल बने रहेंगे। आरव शर्मा और उनके परिवार की सुरक्षा को देखते हुए यह भी जरूरी है कि धमकी के स्रोत और संभावित अन्य संलिप्त व्यक्तियों की पहचान में कोई चूक न हो। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पुलिस को डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर पूरे मामले का खुलासा करना चाहिए।
