नई दिल्ली (शिखर समाचार)। 16 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है। केंद्र सरकार संसद में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करने जा रही है, जिसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही परिसीमन विधेयक, 2026 भी लाया जाएगा, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
महिला आरक्षण और सीटों का विस्तार
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना है। इसमें 815 सीटें राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से होंगी। इस विस्तार के साथ लगभग 280 से अधिक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं, जो ‘नारी शक्ति’ के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
हालांकि, इस विधेयक का दूसरा पहलू परिसीमन देश में उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक संतुलन को लेकर विवाद का कारण बन गया है। नए परिसीमन में आबादी को आधार बनाया गया है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।
इसके विपरीत तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों की राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी घटने की आशंका जताई जा रही है। क्षेत्रीय दलों का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
विपक्ष का हमला और आगे की राह
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विपक्ष ने इस पूरे प्रस्ताव को महिला आरक्षण की आड़ में राजनीतिक पुनर्संरचना करार दिया है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने सर्वदलीय बैठक के बाद कहा कि सरकार इस मुद्दे को चुनावी रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। विपक्ष की मांग है कि महिलाओं के आरक्षण में ओबीसी वर्ग के लिए अलग कोटा तय किया जाए।
वहीं नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से इस विधेयक का समर्थन करने की अपील करते हुए इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताया है। सरकार की योजना है कि विशेष सत्र में ही इसे पारित कर लिया जाए, ताकि 2029 के आम चुनावों में इसे लागू किया जा सके। लेकिन विपक्ष और दक्षिणी राज्यों के कड़े रुख को देखते हुए साफ है कि संसद का आगामी सत्र काफी हंगामेदार रहने वाला है और देश एक नई राजनीतिक बहस के दौर में प्रवेश कर चुका है।
