नई शिक्षा नीति और एक छात्रा का सवाल: क्या एक परीक्षा तीन वर्षों की मेहनत से बड़ी हो गई है?

Rashtriya Shikhar
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A student raises a question on the New Education Policy: Is a single examination now considered more important than three years of effort? IMAGE CREDIT TO फाइल फोटो

अनन्या तिवारी
मुंबई विश्वविद्यालय की स्नातक छात्रा

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रणाली और CUET PG की भूमिका

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मैं मुंबई विश्वविद्यालय की छात्रा रही हूँ। स्नातक में मेरा प्रदर्शन लगातार उत्कृष्ट रहा। मेरी CGPA 9+ थी और मैं अपने कॉलेज की टॉपर छात्राओं में शामिल थी। अंग्रेज़ी साहित्य मेरा मेजर विषय था तथा इतिहास मेरा माइनर। स्नातक के दौरान मुझे हमेशा यह विश्वास दिलाया गया कि मेहनत, निरंतरता और अकादमिक गुणवत्ता ही उच्च शिक्षा का आधार होती हैं।

लेकिन वर्ष 2026 में दिल्ली आने के बाद मुझे एहसास हुआ कि देश की राजधानी में मेरी तीन वर्षों की मेहनत का महत्व लगभग समाप्त हो चुका है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में MA पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आज लगभग पूरा भविष्य एक परीक्षा CUET PG पर निर्भर है। यदि आपने समय रहते सही विषय नहीं चुना, या किसी कारणवश परीक्षा में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए, तो आपके पिछले शैक्षणिक रिकॉर्ड का मूल्य नगण्य रह जाता है।

विषय चयन और व्यक्तिगत परिस्थिति का प्रभाव

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मेरे साथ भी यही हुआ। जब मैंने CUET PG का फॉर्म भरा, तब मुझे नहीं पता था कि उसी वर्ष परिवार का स्थानांतरण मुंबई से दिल्ली हो जाएगा। मैंने अंग्रेज़ी विषय से परीक्षा दी, क्योंकि उसी विषय में स्नातक कर रही थी।

उस समय यह कल्पना भी नहीं थी कि आगे चलकर इतिहास में MA करना चाहूँगी। लेकिन दिल्ली आने के बाद मेरी रुचि इतिहास में उच्च अध्ययन की ओर बढ़ी। तब मुझे बताया गया कि चूँकि मैंने CUET PG में इतिहास विषय नहीं चुना था, इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास में MA प्रवेश लगभग असंभव है, भले ही मेरा इतिहास में माइनर और अच्छा अकादमिक प्रदर्शन रहा हो।

क्या एक परीक्षा पूरी क्षमता को माप सकती है?

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यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या एक दिन की वस्तुनिष्ठ परीक्षा किसी छात्र के तीन वर्षों के अकादमिक प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए?

विशेष रूप से मानविकी विषयों में, जहाँ अध्ययन केवल तथ्यों का नहीं बल्कि व्याख्या, विश्लेषण और शोधपरक सोच का होता है, वहाँ बहुविकल्पीय (MCQ) परीक्षा किसी विद्यार्थी की वास्तविक क्षमता को पूरी तरह कैसे माप सकती है?

नई शिक्षा नीति 2020 को लचीलापन और बहुविषयक शिक्षा के नाम पर प्रस्तुत किया गया था, लेकिन व्यवहार में कई छात्रों के लिए यह प्रणाली अधिक कठोर और केंद्रीकृत प्रतीत होती है।

शिक्षा व्यवस्था में लचीलापन और पुनर्विचार की आवश्यकता

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विशेषकर उन विद्यार्थियों के लिए जिनके माता-पिता स्थानांतरण वाली नौकरियों में हैं, यह व्यवस्था कई बार अन्यायपूर्ण साबित होती है। भारत जैसे विशाल देश में अचानक शहर बदलना असामान्य नहीं है, लेकिन वर्तमान प्रवेश प्रणाली यह मानकर चलती है कि हर छात्र भविष्य की हर परिस्थिति पहले से जानता होगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई शिक्षक निजी बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि केवल एक परीक्षा के आधार पर छात्रों को सीमित करना उचित नहीं है, परन्तु वे नियमों से बँधे होते हैं।

दूसरी ओर, कई विश्वविद्यालय अब भी शैक्षणिक रिकॉर्ड और विषयगत योग्यता को महत्व देते हैं, जिससे प्रवेश प्रक्रिया अपेक्षाकृत अधिक लचीली प्रतीत होती है।

आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और बदलते रोजगार बाजार के कारण डिग्रियों का स्वरूप बदल रहा है, तब शिक्षा व्यवस्था को और अधिक अवसर-आधारित होना चाहिए, न कि केवल छँटनी-आधारित।

निष्कर्ष: अवसर बनाम परीक्षा

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मैं यह नहीं कह रही कि प्रवेश परीक्षाएँ समाप्त कर दी जाएँ। लेकिन क्या किसी छात्र के सतत अकादमिक प्रदर्शन, शोध क्षमता और विषयगत समझ को भी समान महत्व नहीं मिलना चाहिए?

आज स्थिति यह है कि एक परीक्षा चूक जाने, गलत विषय चुन लेने या एक दिन खराब प्रदर्शन करने से छात्रों के लिए बड़े विश्वविद्यालयों के दरवाज़े लगभग बंद हो जाते हैं।

क्या यही नई शिक्षा नीति की वास्तविक भावना थी?

शिक्षा का उद्देश्य अवसर देना होना चाहिए, न कि उसे सीमित करना।

मैं नौकरी नहीं माँग रही। मैं केवल पढ़ने का अवसर माँग रही हूँ।

और यह प्रश्न केवल मेरा नहीं, बल्कि उन हजारों छात्रों का है जो अनिश्चितताओं और केंद्रीकृत प्रवेश प्रणालियों के बीच अपनी शिक्षा बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

अनन्या तिवारी

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