नारद संवाद लोकमंगल के लिए, स्व का बोध राष्ट्र विकास की कुंजी

Rashtriya Shikhar
4 Min Read
Narad Samvad for the welfare of society IMAGE CREDIT TO प्रोफेसर संजय द्विवेदी

कानपुर (शिखर समाचार)। देवर्षि नारद जयंती के अवसर पर छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में वक्ताओं ने पत्रकारिता के मूल्यों, संवाद की पवित्रता और राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका पर विस्तार से विचार रखे। कार्यक्रम का विषय राष्ट्रवादी पत्रकारिता में स्व का बोध रहा।

नारद: संवाद और लोकमंगल के प्रतीक

ALSO READ:https://www.jagran.com/uttar-pradesh/ghaziabad-indirapuram-woman-death-family-halts-last-rites-demands-probe-40199229.html

भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि देवर्षि नारद की जो लोक छवि प्रचलित है, वह उनके वास्तविक व्यक्तित्व से भिन्न है। उन्हें अक्सर कलह उत्पन्न करने वाला माना जाता है, जबकि उनके प्रत्येक संवाद में लोकमंगल की भावना निहित रहती है। उन्होंने कहा कि नारद का संवाद कभी निरर्थक नहीं होता, बल्कि उद्देश्यपूर्ण और समाजहितकारी होता है।
प्रो. द्विवेदी ने बताया कि नारद देवताओं, असुरों और समाज के सभी वर्गों के बीच संवाद स्थापित करने वाले सेतु हैं। सभी उन पर विश्वास करते हैं और वे सलाहकार, मित्र तथा मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के लिए विश्वसनीयता, सतत प्रवास और उद्देश्य की पवित्रता अत्यंत आवश्यक गुण हैं, जो नारद के जीवन से स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

पत्रकारिता में मूल्य और विश्वसनीयता की आवश्यकता

ALSO READ:https://rashtriyashikhar.com/town-vending-committee-meeting-in-presence/

उन्होंने यह भी कहा कि नारद किसी आश्रम या मठ की स्थापना नहीं करते, बल्कि निरंतर प्रवास करते हुए संवाद और संपर्क बनाए रखते हैं। उनका हर कार्य लोकमंगल की भावना से प्रेरित होता है। समाज को बेहतर बनाने के लिए सार्वजनिक संवाद में शुचिता और मूल्यबोध का होना आवश्यक है, तभी संवाद लोकहित केंद्रित बन सकेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कहा कि देवर्षि नारद को भारतीय परंपरा में प्रथम पत्रकार माना जाता है, जिन्होंने सदैव सत्य और लोकहित को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। स्व का बोध ही व्यक्ति को अपनी संस्कृति, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से जोड़ता है, जो राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

नारद जयंती: आत्ममंथन और मार्गदर्शन का अवसर

ALSO READ:https://rashtriyashikhar.com/humorous-poetry-recitation-by-shambhu-shekhar/

विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर अवस्थी ने कहा कि नारद जयंती केवल एक पौराणिक आयोजन नहीं, बल्कि पत्रकारिता के आदर्शों पर आत्ममंथन का अवसर है। उन्होंने कहा कि सूचना की गति से अधिक उसकी सत्यता और उद्देश्य महत्वपूर्ण होना चाहिए।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. हरिओम कुमार ने वैश्विक स्तर पर नारद संचार मॉडल को स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। संचालन करते हुए डॉ. ओम शंकर गुप्ता ने कहा कि नारद का व्यक्तित्व और कार्यशैली मीडिया जगत के लिए मार्गदर्शक स्तंभ की तरह है और छात्रों को उनके संवाद मॉडल का अध्ययन करना चाहिए।

अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. योगेंद्र कुमार पांडेय ने किया। कार्यक्रम में डॉ. जितेंद्र डबराल, प्रेम किशोर शुक्ला, सागर कनौजिया सहित अनेक शिक्षक एवं छात्र छात्राएं ऑनलाइन माध्यम से जुड़े।

Share This Article
Leave a comment