शामली (शिखर समाचार)। शहर के जैन धर्मशाला में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन करते हुए आचार्य 108 विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान है, लेकिन अधिकांश लोग इसे केवल सांसारिक योजनाओं और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति में व्यतीत कर देते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जीवन भर भविष्य की योजनाएं बनाता रहता है, किंतु यह निश्चित नहीं होता कि उसे उन सभी योजनाओं को पूरा करने का अवसर प्राप्त होगा।
मनुष्य जीवन की दुर्लभता और आत्मबोध का संदेश
आचार्य ने कहा कि शरीर और संसार की अनेक बातें समय के साथ भुला दी जाती हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक कर्तव्य स्वयं को पहचानना और अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना है। मनुष्य को विवेक, संयम और समझदारी के साथ जीवन जीना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार कर्म ही जीव को जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखते हैं और मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि कर्मों के अनुसार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने की प्रक्रिया है। यदि मनुष्य यह स्मरण रखे कि एक दिन उसे इस संसार को छोड़कर जाना है, तो उसके जीवन की दिशा बदल सकती है।
मृत्यु के स्मरण से जीवन में आता है सकारात्मक परिवर्तन
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आचार्य विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि मृत्यु का स्मरण भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है। इससे व्यक्ति मोह, अहंकार और संग्रह की प्रवृत्तियों को कम कर धर्म, सदाचार और आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होता है।
उन्होंने कहा कि धन, संपत्ति, परिवार, पद और प्रतिष्ठा जैसी सांसारिक वस्तुएं स्थायी नहीं हैं। मृत्यु के समय सब कुछ यहीं रह जाता है और जीव केवल अपने कर्मों के साथ आगे बढ़ता है। इस सत्य को समझने वाला व्यक्ति समय का सदुपयोग करते हुए श्रेष्ठ कर्मों और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ध्यान देता है।
