गढ़मुक्तेश्वर (शिखर समाचार)। बहादुरगढ़ क्षेत्र में स्थित महाराजा अग्रसेन सरस्वती शिशु मंदिर के प्रांगण में आयोजित वंदना सत्र राष्ट्रभक्ति, त्याग और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत रहा। विद्यालय में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई और महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती श्रद्धा के साथ मनाई गई। इसके साथ ही सिख इतिहास की अमर गाथा को स्मरण करते हुए गुरु गोविंद सिंह के परिवार, विशेषकर साहिबज़ादों के अद्वितीय बलिदान को नमन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को देश, धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूक करना रहा।
मालवीय की दृष्टि में शिक्षा और संस्कृति का समन्वय, गंगा सभा ने दी नई प्रेरणा
समारोह की अध्यक्षता विद्यालय अध्यक्ष मूलचंद आर्य ने की। मुख्य अतिथि सूबेदार जगदीश सिंह चौहान ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे महान शैक्षिक केंद्र की स्थापना संभव हो सकी। उन्होंने गंगा सभा के गठन का उल्लेख करते हुए बताया कि गंगा तटों पर आरती और जनजागरण की परंपरा को संगठित रूप देने में मालवीय की भूमिका ऐतिहासिक रही। उनका जीवन शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित था।
वक्ताओं ने अटल बिहारी वाजपेई के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे केवल एक कुशल प्रशासक ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कवि और विचारशील चिंतक भी थे। उनकी काव्य रचनाएं आज भी देशवासियों में आत्मगौरव और आत्मबल का संचार करती हैं। वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षण का निर्णय लेकर उन्होंने विश्व मंच पर भारत की शक्ति और संप्रभुता को स्थापित किया, जिससे देश का मान बढ़ा।
साहिबजादों के अदम्य साहस ने दिखाई धर्म और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च त्याग की मिसाल
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कार्यक्रम में गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह के बलिदान का हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया। बताया गया कि अत्याचार के समय भी दोनों साहिबज़ादों ने धर्म और राष्ट्र के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया। फतेह सिंह द्वारा अपने बड़े भाई को पहले बलिदान देने की बात कहना उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें व्यक्तिगत जीवन से ऊपर राष्ट्र और धर्म को रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि गुरु गोविंद सिंह के चारों पुत्रों का बलिदान भारतीय इतिहास में त्याग और शौर्य की अमिट मिसाल है।
कार्यक्रम का संचालन प्रधानाचार्य सुरेश चंद्र शर्मा ने किया। इस अवसर पर विद्यालय कोषाध्यक्ष विनोद कुमार, सिमरन, हरी गिरी, नीतू सिंह, नीरज कुमारी, ताप्ती भूषण सहित अनेक शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। अंत में सभी ने महान विभूतियों के आदर्शों को आत्मसात करने और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
