नई दिल्ली (शिखर समाचार)। भारतीय भाषा अभियान के तत्वावधान में सर्वोच्च न्यायालय परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में “जनता का न्याय जनता की भाषा में” विषय पर भाषा, संस्कृति और समावेशी विकास को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में डॉ. किशोर त्रिपाठी (महासचिव, श्री अरविंद आश्रम, पुडुचेरी) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
भाषा और न्याय व्यवस्था पर जोर
अपने संबोधन में डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि न्याय तभी प्रभावी होता है, जब वह आम लोगों की समझ में आने वाली भाषा में उपलब्ध हो। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की पहचान, आत्मसम्मान और अधिकारों तक पहुंच का सशक्त साधन भी है। यदि न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं जनभाषाओं में हों, तो लोगों का विश्वास व्यवस्था में और मजबूत होगा।
डॉ. त्रिपाठी ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर भी जोर दिया। उन्होंने भारतीय और इंडियन दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीयता केवल भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक चेतना, परंपराओं और मूल्यों से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखना जरूरी है।
समावेशी विकास और सतत विकास लक्ष्य
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सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के संदर्भ में वक्ताओं ने कहा कि वास्तविक विकास वही है जो समाज के हर वर्ग तक पहुंचे और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनता का विकास केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शिक्षा, भाषा, संस्कृति और सामाजिक न्याय का समन्वय भी आवश्यक है।
कार्यक्रम में एकता में विविधता की अवधारणा पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि विभिन्न भाषाओं, परंपराओं और संस्कृतियों के बावजूद भारत की एकता उसकी सबसे बड़ी ताकत है, और इसे बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
मातृभाषा और सांस्कृतिक संरक्षण
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संस्कृति के संरक्षण के लिए मातृभाषा के सम्मान, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, स्थानीय रीति-रिवाजों को बढ़ावा देने और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने जैसे बिंदुओं पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से न्याय, संस्कृति और विकास के मूल्यों को समाज के हर स्तर तक पहुंचाने के प्रयास लगातार जारी रहेंगे।
