——–किसानों को त्वरित मुआवजा, राज्यों को अधिक अधिकार और बीजों की कीमत नियंत्रित करने की उठाई मांग
नई दिल्ली (शिखर समाचार)। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नए बीज विधेयक, 2025 को लेकर भारतीय कृषक समाज ने किसानों के हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण सुझाव केंद्र सरकार के समक्ष रखे हैं। भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष कृष्णवीर सिंह चौधरी ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री को दिए सुझावों में कहा है कि नया विधेयक गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता और नकली बीजों पर रोक की दिशा में सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसे किसान केंद्रित बनाना जरूरी है।
त्वरित मुआवजे के लिए हो स्वतंत्र समिति
कृष्णवीर सिंह चौधरी ने कहा कि यदि पंजीकृत बीज से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिलता है तो किसान को मुआवजे के लिए उपभोक्ता अदालतों की लंबी और खर्चीली प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके स्थान पर विकासखंड या जिला स्तर पर स्वतंत्र कृषि शिकायत निवारण समिति गठित की जानी चाहिए, ताकि बीज विफल होने की स्थिति में किसानों को शीघ्र मुआवजा मिल सके।
भारतीय कृषक समाज ने विधेयक में शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीकरण पर चिंता जताते हुए राज्यों को अपने कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अनुपयुक्त बीजों पर रोक लगाने, लाइसेंस रद्द करने और आवश्यकतानुसार मूल्य नियंत्रण का स्पष्ट अधिकार देने की मांग की है। बड़े निजी और बहुराष्ट्रीय बीज उत्पादकों द्वारा मनमानी कीमत वसूलने से किसानों को बचाने के लिए बीजों की अधिकतम कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था की मांग भी की गई है।
पारंपरिक बीजों और बीज संप्रभुता की सुरक्षा जरूरी
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कृष्णवीर सिंह चौधरी ने किसानों के पारंपरिक बीजों को बोने, आदान-प्रदान करने और बेचने के अधिकार को सुरक्षित रखने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि स्थानीय बीजों और जैविक खेती करने वाले छोटे किसानों को अनावश्यक पंजीकरण और नियमों में नहीं उलझाया जाना चाहिए। विदेशी परीक्षण और प्रमाणन एजेंसियों को मान्यता देने के प्रस्ताव पर भी उन्होंने चिंता जताते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका मजबूत रखने की बात कही।

बड़ी कंपनियों के एकाधिकार पर लगे रोक
भारतीय कृषक समाज ने कहा कि केंद्रीय मान्यता व्यवस्था और क्यूआर कोड आधारित निगरानी जैसे प्रावधान छोटे बीज उत्पादकों और किसान उत्पादक संगठनों के लिए सरल किए जाने चाहिए। कृष्णवीर सिंह चौधरी ने कहा कि देश की खाद्य सुरक्षा की पहली आवश्यकता बीज है। आनुवंशिक रूप से संशोधित, पारजीनी और जीन संपादन जैसी तकनीकों के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज क्षेत्र पर एकाधिकार देश की बीज स्वतंत्रता और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। उन्होंने कहा कि तकनीक के नाम पर देश की खाद्य सुरक्षा से समझौता स्वीकार्य नहीं है। भारतीय कृषक समाज ने मांग की कि अंतिम विधेयक में किसान की बीज संप्रभुता, त्वरित मुआवजा और राज्यों की स्वायत्तता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
