——-राष्ट्रीय शिखर के समाचार संपादक आरव शर्मा को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर धमकी देने के मामले में गाजियाबाद पुलिस की थी बड़ी कामयाबी, क्राइम ब्रांच से लेकर विजयनगर पुलिस तक की टीमों ने झोंकी थी ताकत
गाजियाबाद (शिखर समाचार)। राष्ट्रीय शिखर के समाचार संपादक आरव शर्मा को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर जान से मारने की धमकी देने के मामले में गाजियाबाद पुलिस ने जिस तेजी और रणनीतिक सूझबूझ के साथ कार्रवाई की, वह पुलिस प्रशासन की सक्रियता का उदाहरण है। पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ के नेतृत्व में गाजियाबाद पुलिस ने महज एक सप्ताह के भीतर महाराष्ट्र के नागपुर तक पहुंचकर उस अंशु प्रजापति को गिरफ्तार कर लिया, जिसका नाम धमकी भरे वॉइस नोट में सामने आया था। इस कार्रवाई में क्राइम ब्रांच टीम, स्वाट टीम गाजियाबाद और विजयनगर थाना पुलिस की अलग-अलग टीमों को लगाया गया। पुलिस कमिश्नर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए टीमों को तत्काल सक्रिय किया और गुजरात तथा महाराष्ट्र की ओर रवाना कर आरोपी की तलाश तेज कराई।
पुलिस कमिश्नर के नेतृत्व में एक सप्ताह में नागपुर से गिरफ्तारी
इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ की कार्यशैली और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता विशेष रूप से चर्चा में है। पत्रकार की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामले को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने जांच को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दूसरे राज्यों तक पुलिस टीमों को भेजकर आरोपी तक पहुंचने की रणनीति बनाई। लगातार प्रयासों के बाद नागपुर से गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि पुलिस ने मामले को प्राथमिकता पर लेकर कार्रवाई की।
हालांकि आरोपी अंशु प्रजापति की गिरफ्तारी के बाद इस प्रकरण में एक ऐसा सवाल सामने आया है, जिसने पूरे मामले की गुत्थी को और उलझा दिया है। दरअसल, धमकी के मामले में 13 अक्टूबर को आरव शर्मा के मोबाइल फोन पर एक हेलो का संदेश आया था। बाद में धमकी भरे वॉइस नोट में अंशु प्रजापति के नाम का उल्लेख किया गया था। गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस जांच अधिकारी और आरव शर्मा के परिजनों के सामने आरोपी से 13 अक्टूबर को आए हेलो संदेश के बारे में सवाल किया गया तो उसने साफ तौर पर इससे इनकार कर दिया। उसने कहा कि यह संदेश उसने नहीं भेजा था। यदि गिरफ्तार आरोपी यह स्वीकार कर लेता कि हेलो का मैसेज उसने भेजा था तो हो सकता था कि इस मामले का उसकी गिरफ्तारी से ही पटाक्षेप हो जाता, लेकिन उसके इनकार के बाद शक की सूई कहीं और घूम गई।
13 अक्टूबर के हेलो संदेश ने खड़े किए कई सवाल
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यही बयान इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। यदि आरोपी 13 अक्टूबर के हेलो संदेश को भी अपना बताता तो जांच की एक कड़ी सीधे जुड़ सकती थी और मामले की तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो सकती थी। लेकिन उसके इनकार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर 13 अक्टूबर को हेलो संदेश किसने भेजा था? क्या धमकी भरे वॉइस नोट और शुरुआती संदेश के पीछे एक ही व्यक्ति था या इस पूरे घटनाक्रम में कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल है?
जांच में सामने आए मोबाइल नंबर और उससे जुड़ी जानकारियों में अंशु प्रजापति के साथ धर्मेश वधैर का नाम भी सामने आने की बात कही गई है। ऐसे में पुलिस के सामने अब केवल गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ ही नहीं, बल्कि मोबाइल नंबर, सिम कार्ड, संदेशों और वॉइस नोट के स्रोत की भी गहराई से जांच करने की चुनौती है।
गिरोह के नाम पर धमकी या किसी संगठित साजिश का हिस्सा?
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सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या धमकी देने वाला व्यक्ति वास्तव में किसी संगठित गिरोह से जुड़ा है या उसने गिरोह का नाम लेकर दहशत फैलाने की कोशिश की? केवल आरोपी की गिरफ्तारी और उसके बयान से इस सवाल का अंतिम जवाब नहीं मिल सकता। इसके लिए तकनीकी साक्ष्यों और अन्य संभावित आरोपियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ के नेतृत्व में गाजियाबाद पुलिस ने एक सप्ताह के भीतर नागपुर से आरोपी को गिरफ्तार कर निश्चित रूप से महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है, लेकिन इस कार्रवाई का अगला और सबसे अहम चरण धमकी की पूरी साजिश का पर्दाफाश करना है। जब तक 13 अक्टूबर के संदेश का वास्तविक स्रोत, वॉइस नोट भेजने वाले की भूमिका और संभावित अन्य संलिप्त लोगों की पहचान नहीं हो जाती, तब तक आरव शर्मा और उनके परिजनों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहेगी।
अब निगाहें पुलिस की अगली जांच पर टिकी हैं। उम्मीद है कि पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर जांच टीम इस मामले की हर कड़ी को जोड़कर न केवल धमकी देने वाले वास्तविक व्यक्ति तक पहुंचेगी, बल्कि पत्रकार और उसके परिवार को मिल रही जानलेवा धमकी के पीछे की पूरी सच्चाई भी सामने लाएगी।
