निर्जला एकादशी की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु

Rashtriya Shikhar
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“Devotees were deeply moved after listening to the story of Nirjala Ekadashi” IMAGE CREDIT TO रिपोर्टर

मुरादनगर (शिखर समाचार)।
सात दिवसीय ग्रीष्मकालीन श्री राधा माधव लीला महामहोत्सव के अंतर्गत आयोजित कथा में गौरदास जी महाराज ने निर्जला एकादशी के महत्व एवं भक्तराज अम्बरीश की पावन कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

निर्जला एकादशी और भक्त अम्बरीश की भक्ति का वर्णन

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गौरदास जी महाराज ने कहा कि भक्तराज अम्बरीश भगवान श्रीहरि के परम भक्त थे। राजपाट के दायित्वों का निर्वहन करने के साथ-साथ वे स्वयं ठाकुर जी की सेवा में सदैव समर्पित रहते थे। भगवान के भोग के लिए अपने हाथों से चक्की चलाकर आटा पीसते थे। उनकी निष्काम भक्ति और अटूट समर्पण से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनकी सेवा में तत्पर रहते थे।

उन्होंने बताया कि जब-जब राजा अम्बरीश ब्रज में ठाकुर जी की सेवा में लीन रहते थे, तब भगवान के आदेश से सुदर्शन चक्र उनके राज्य की रक्षा करता था।

महर्षि दुर्वासा की परीक्षा और धर्मसंकट की स्थिति

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कथा के दौरान महाराज ने बताया कि एक बार महर्षि नारद कुंभ क्षेत्र में भक्तराज अम्बरीश की महिमा का वर्णन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संसार में अम्बरीश जैसा भक्त दुर्लभ है। यह सुनकर महर्षि दुर्वासा को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

निर्जला एकादशी के दिन राजा अम्बरीश ने विधि-विधान से व्रत रखा। द्वादशी के पारण के समय महर्षि दुर्वासा उनके महल पहुंचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार कर भोजन का आग्रह किया, लेकिन दुर्वासा ऋषि स्नान के लिए चले गए और काफी देर तक वापस नहीं लौटे। इस बीच द्वादशी का पारण का समय समाप्त होने लगा। धर्मसंकट की स्थिति में विद्वानों की सलाह पर राजा अम्बरीश ने केवल जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया।

सुदर्शन चक्र प्रसंग और भक्ति की विजय

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जब महर्षि दुर्वासा लौटे तो उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर राजा को शाप देने का प्रयास किया। तभी भगवान का सुदर्शन चक्र उनकी ओर बढ़ा। भयभीत होकर दुर्वासा ऋषि ब्रह्मा, भगवान शिव और अंत में भगवान विष्णु के पास पहुंचे, लेकिन किसी ने भी उन्हें बचाने में असमर्थता जताई। अंततः भगवान विष्णु ने कहा कि वे अपने भक्तों के अधीन हैं और उन्हें क्षमा तभी मिलेगी जब वे राजा अम्बरीश से क्षमा याचना करेंगे।

इसके बाद महर्षि दुर्वासा ने राजा अम्बरीश से क्षमा मांगी। राजा की विनम्रता, क्षमाशीलता और भक्तिभाव से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र शांत हो गया। गौरदास जी महाराज ने कहा कि यह कथा सच्ची भक्ति, विनम्रता, क्षमा और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देती है। भगवान अपने सच्चे भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं।

कथा के उपरांत श्रद्धालुओं ने भजन कीर्तन का आनंद लिया तथा भगवान श्री राधा माधव की आरती में सहभागी होकर धर्मलाभ प्राप्त किया।

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