हापुड़ (शिखर समाचार) सरस्वती इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ एवं हॉस्पिटल ने चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए नौ वर्ष की एक बच्ची पर अत्यंत जटिल और दुर्लभ बाल्यावस्था किडनी शल्य चिकित्सा को सफलतापूर्वक पूरा किया है। यह शल्य प्रक्रिया हापुड़ क्षेत्र में इस कम आयु के बच्चे में की गई प्रारंभिक सफल न्यूनतम चीरा किडनी शल्य क्रियाओं में शामिल मानी जा रही है। इस सफलता के साथ संस्थान ने उन्नत तृतीयक चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में एक नया मानदंड स्थापित किया है।
एक साल की पीड़ा का खुलासा: दुर्लभ बीमारी से जूझ रही थी मासूम, किडनी पर मंडरा रहा था बड़ा खतरा
मरीज बच्ची त्रिशा जो हेरा लाल और पिंकी की पुत्री है, बीते लगभग एक वर्ष से पेट के दाहिने हिस्से में लगातार तेज दर्द से परेशान थी। प्रारंभिक स्तर पर इसे साधारण पेट दर्द मानकर उपचार किया गया, लेकिन जब पीड़ा कम नहीं हुई तो सरस्वती मेडिकल संस्थान में विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराए गए। जांच में यह सामने आया कि बच्ची पेल्वी-यूरीटेरिक जंक्शन अवरोध नामक गंभीर समस्या से ग्रसित है, जिसके कारण उसकी किडनी में अत्यधिक सूजन आ गई थी। चिकित्सकीय भाषा में इस स्थिति को गंभीर हाइड्रोनेफ्रोसिस कहा जाता है। समय रहते उपचार न होने की दशा में किडनी को स्थायी क्षति या पूरी तरह खराब होने का खतरा बना हुआ था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संस्थान की मूत्र रोग विशेषज्ञ टीम ने न्यूनतम चीरा तकनीक से लैप्रोस्कोपिक पायलोप्लास्टी करने का निर्णय लिया। यह आधुनिक शल्य पद्धति पारंपरिक खुली शल्य चिकित्सा की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि इसमें छोटे चीरे लगाए जाते हैं, दर्द कम होता है और रोगी तेजी से स्वस्थ होता है। बच्चों में इस तरह की शल्य क्रिया करना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि उनकी शारीरिक संरचना अत्यंत संवेदनशील होती है।
वरिष्ठ विशेषज्ञ की कुशल अगुवाई में रचा गया चिकित्सा इतिहास, हापुड़ में संभव हुई उन्नत बाल किडनी सर्जरी
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इस जटिल शल्य चिकित्सा का नेतृत्व वरिष्ठ मूत्र रोग विशेषज्ञ सौरभ गौर ने किया। उनके अनुभव, सूक्ष्म तकनीकी दक्षता और सटीक निर्णय क्षमता के कारण यह कठिन मामला पूरी तरह सफल रहा। हापुड़ जैसे जिले में इस स्तर की उन्नत बाल्यावस्था किडनी शल्य चिकित्सा का सफलतापूर्वक संपन्न होना क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, जिससे अब मरीजों को इलाज के लिए महानगरों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा।
शल्य चिकित्सा दल में सुमित, संग्राम और मल्लिका सहित अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके साथ ही संज्ञाहरण विशेषज्ञों, नर्सिंग कर्मियों और ऑपरेशन कक्ष तकनीकी स्टाफ ने भी पूरी निष्ठा और समन्वय के साथ कार्य किया। शल्य प्रक्रिया पूर्णतः सफल रही और बच्ची को किसी भी प्रकार की शल्य या पश्चात जटिलता का सामना नहीं करना पड़ा।
सफल सर्जरी के बाद लौटी मुस्कान, न्यूनतम चीरा तकनीक ने दिलाई मासूम को नई जिंदगी
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शल्य चिकित्सा के बाद बच्ची ने तेजी से स्वास्थ्य लाभ किया और चिकित्सकों द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ घोषित किए जाने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। यह परिणाम बाल्यावस्था में न्यूनतम चीरा तकनीक की प्रभावशीलता और सुरक्षा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
यह जीवनरक्षक उपचार सरस्वती मेडिकल संस्थान की आधुनिक चिकित्सा अवसंरचना और रोगी-केंद्रित सोच के कारण संभव हो सका। संस्थान में अत्याधुनिक ऑपरेशन कक्ष, उन्नत लैप्रोस्कोपिक प्रणाली, पूर्ण रूप से सुसज्जित बाल चिकित्सा गहन चिकित्सा इकाई तथा चौबीसों घंटे आपात और गंभीर देखभाल सेवाएं उपलब्ध हैं। विशेष बात यह रही कि यह जटिल शल्य चिकित्सा किफायती लागत पर की गई, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को भी उच्च स्तरीय उपचार मिल सका।
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बच्ची के माता-पिता ने भावुक होकर बताया कि उन्हें विश्वास नहीं था कि इतनी बड़ी शल्य चिकित्सा इतने छोटे चीरे से संभव हो सकती है। उन्होंने चिकित्सकों और अस्पताल प्रबंधन के प्रति आभार जताया।
इस उपलब्धि पर संस्थान के वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारियों एन. वर्धराजन, रघुवर दत्त, वाई. सी. गुप्ता और चिकित्सा अधीक्षक मेजर जनरल चरनजीत सिंह अहलूवालिया ने पूरी चिकित्सा टीम को बधाई दी। वहीं सरस्वती समूह के अध्यक्ष जे. रामचंद्रन और उपाध्यक्ष राम्या रामचंद्रन ने भी चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और सहयोगी कर्मियों की सराहना करते हुए इसे मानव सेवा की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम बताया। यह ऐतिहासिक बाल्यावस्था किडनी शल्य चिकित्सा एक बार फिर प्रमाणित करती है कि सरस्वती इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ एवं हॉस्पिटल उन्नत चिकित्सा, नवाचार, किफायती उपचार और करुणामय सेवा के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।
