भारत मंडपम में सनातन का महासम्मेलन: 300 से अधिक संतों की उपस्थिति में गूँजी संस्कृति पुनर्जागरण की गर्जना

Rashtriya Shikhar
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Sanatan Mahasammelan at Bharat Mandapam: The roar of cultural renaissance echoed in the presence of over 300 saints IMAGE CREDIT TO sanatan nyas

नई दिल्ली/प्रगति मैदान। 15 नवंबर 2025 को भारत मंडपम का प्रांगण उस समय आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित हो उठा, जब ॐ सनातन न्यास द्वारा आयोजित सनातन संत सम्मेलन 2025 का शुभारंभ देशभर और विदेशों से आए 300 से अधिक संतों की दिव्य उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य था सनातन संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और उसकी प्राचीन परंपराओं के पुनर्जीवन का संदेश जन-जन तक पहुँचाना।

स्वामी गोविंद देव गिरी महाराज ने दिया संदेश: सनातन धर्म मानवता की राह दिखाने वाला वैश्विक मार्ग, एकता और प्रेम का प्रतीक

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कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रसंत परम पूज्य स्वामी गोविंद देव गिरी महाराज ने की। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि समय की मांग है कि सभी संत और समाज मिलकर सनातन की जड़ें और अधिक सुदृढ़ करें। उन्होंने कहा कि सनातन केवल धार्मिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि मानवता को सही दिशा दिखाने वाला वैश्विक मार्ग है। स्वामी गोविंद देव गिरी ने एकता, प्रेम और जागरूकता को सनातन का वास्तविक स्वरूप बताते हुए उपस्थित जनों को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकल्प लेने का आह्वान किया।

जैन आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि विश्व जिस असंतुलन और तनाव के दौर से गुजर रहा है, उसमें सनातन संस्कृति ही वह आधार है, जो शांति और समाधान प्रदान कर सकती है। उन्होंने बताया कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन’ जैसे सिद्धांत संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी हैं।

देवकीनंदन ठाकुर ने कहा: घर-घर सनातन मूल्य स्थापित करना ही भारत के सशक्त राष्ट्र निर्माण की कुंजी

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प्रख्यात कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने समाज में वैचारिक जागृति की आवश्यकता बताते हुए कहा कि यदि भारत को सशक्त बनाना है, तो पहले घर-घर में सनातन जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित करना होगा। उन्होंने सनातन धर्म की एकता और सामूहिक शक्ति को राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य ऊर्जा बताया।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि सनातन अनादि है, अनंत है और विश्व की चेतना का केंद्र है। उन्होंने कहा कि प्रकृति संरक्षण, मानव सेवा और सांस्कृतिक संरक्षण ये तीनों मिलकर ही सनातन को जीवंत रखते हैं। उन्होंने समाज को प्रेम, करुणा और नैतिकता के पथ पर चलने का संदेश दिया।

महंत रविंद्र पूरी और सरदार परमजीत सिंह ने बताया: संत और समाज की भूमिका राष्ट्र निर्माण और सद्भाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण

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महंत रविंद्र पूरी ने संत समाज की भूमिका पर विस्तृत विवेचन करते हुए कहा कि राष्ट्र और संस्कृति के मार्गदर्शन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संतों पर है। सिख समाज की ओर से उपस्थित सरदार परमजीत सिंह ने युवाओं को सनातन आदर्शों से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया और समाज में सद्भाव को सबसे बड़ी राष्ट्रीय शक्ति बताया।

सम्मेलन में एकल अभियान भारत लोक शिक्षा परिषद को सनातन रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके साथ तीन अन्य संस्थाओं को सनातन गौरव सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान समारोह ने पूरे कार्यक्रम को और अधिक गौरवपूर्ण बना दिया।

नीरज रायजादा और स्मृति कुच्छल के संयोजन में बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सम्मेलन को सनातन की जीवंत छटा से रोशन किया

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सम्मेलन का संचालन नीरज रायजादा और युवा संचालिका स्मृति कुच्छल ने संयमित और प्रभावी शैली में किया। बच्चों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरा वातावरण जैसे सनातन की जीवंत रंग-छटा से भर दिया। उनकी वेशभूषा, नृत्य और प्रस्तुति ने संत समाज और उपस्थित अतिथियों को विशेष रूप से भावुक कर दिया।

इस आयोजन में प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी, न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्य, उद्योगजगत की प्रमुख हस्तियां, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और शोधकर्ता भी शामिल हुए, जिससे यह आयोजन केवल आध्यात्मिक सम्मेलन नहीं, बल्कि संस्कृति और विचार-विमर्श का वैश्विक मंच बन गया।

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कार्यक्रम का समापन संत समाज द्वारा सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण, राष्ट्र उत्थान और आने वाली पीढ़ियों तक सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित पहुँचाने के संकल्प के साथ किया गया।

यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि
भारत की आत्मा सनातन संस्कृति का आध्यात्मिक पर्व
बनकर उभरा, जिसकी प्रेरक गूंज आने वाले कई वर्षों तक विश्व में सुनाई देती रहेगी।

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