शामली (शिखर समाचार) शहर की जैन धर्मशाला में आयोजित धार्मिक शिविर के तीसरे दिन मुनि प्रतीक सागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जैन धर्म में मंदिर, दर्शन और तीर्थों के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन मंदिर केवल ईंट पत्थर का भवन नहीं, बल्कि आत्मजागरण, साधना और आत्मकल्याण का पवित्र केंद्र होता है।
समोसरन और दर्शन की पवित्र प्रक्रिया
मुनिश्री ने कहा कि जैन मंदिर को समोसरन का प्रतीक माना गया है, जहां तीर्थंकर सम्यक ज्ञान का उपदेश देकर जीवों का कल्याण करते हैं। दर्शन करते समय श्रद्धालु को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। चरण कमल, नाभि कमल, हृदय कमल, मुख कमल और संपूर्ण दिव्य स्वरूप का अवलोकन करने के पश्चात आंखें बंद कर भगवान के शांत वीतराग स्वरूप का मनन-चिंतन करना चाहिए। ऐसा करने से मन एकाग्र होता है और भक्ति गहन एवं प्रभावी बनती है।
मुनिश्री ने पंच परमेष्ठी और चौबीस तीर्थंकरों के नाम स्मरण को ‘नाम मंगल’ बताते हुए कहा कि उनका उच्चारण सदैव श्रद्धा, विनय और समर्पण भाव से करना चाहिए। नाम स्मरण से मन की अशुद्धियां दूर होती हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। द्रव्य मंगल के अंतर्गत भगवान के शरीर तथा उनसे संबंधित उपयोग की वस्तुएं अत्यंत पवित्र मानी जाती हैं, इसलिए उनके प्रति विशेष सावधानी और मर्यादा का पालन आवश्यक है।
आचार-विचार और मंदिर में मर्यादा
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मुनिश्री ने आचार-विचार की शुद्धता पर बल देते हुए कहा कि मुनिराज को अपने वस्त्रों से नहीं पोंछना चाहिए और उनके वस्त्र अलग से धोने चाहिए। भगवान की प्रतिमा के अभिषेक के समय पूर्ण पवित्रता, स्वच्छता और सावधानी बरतनी चाहिए। जिस आसन पर गुरु महाराज विराजमान हों, उस पर किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बैठना चाहिए। यह मर्यादा श्रद्धा और अनुशासन का प्रतीक है।
मुनिश्री ने कहा कि पवित्र स्थलों पर की गई भक्ति, सेवा और साधना आत्मा के कल्याण का सशक्त माध्यम बनती है। यदि श्रद्धालु सही भाव, शुद्ध आचरण और सम्यक दृष्टि के साथ मंदिर में जाएं, तो उनका जीवन आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है। धार्मिक शिविर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुना और जीवन में उन्हें अपनाने का संकल्प लिया।
