जब कोई अपना नहीं होता, तब शालू सैनी बन जाती हैं वारिस

Rashtriya Shikhar
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When no one is there for someone, Shalu Saini becomes their heir — IMAGE CREDIT TO रिपोर्टर

——-एक ही दिन में दो लावारिस शवों का पूरे सम्मान और विधि विधान से किया अंतिम संस्कार

खतौली/मुजफ्फरनगर (शिखर समाचार)। लावारिस और बेसहारा शवों को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देना अब शालू सैनी की पहचान बन चुका है। जैसे ही उन्हें किसी ऐसे मृतक की सूचना मिलती है, जिसका कोई परिजन या वारिस मौजूद नहीं होता, वे बिना देर किए मौके पर पहुंच जाती हैं और पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाती हैं।

लावारिस शवों की सूचना पर तुरंत सक्रियता

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बीते सोमवार को मुजफ्फरनगर जनपद के ककरौली और नई मंडी थाना क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर मिले दो लावारिस शवों का अंतिम संस्कार शालू सैनी ने पूरे सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ कराया। दोनों मामलों में पुलिस द्वारा काफी प्रयास किए जाने के बावजूद मृतकों के किसी परिजन या परिचित का पता नहीं चल सका। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया, पंचनामा और पोस्टमार्टम के बाद दोनों शवों को लावारिस घोषित कर दिया गया।

सूचना मिलते ही शालू सैनी अपनी टीम के साथ अंतिम संस्कार की व्यवस्था में जुट गईं।

सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था

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उन्होंने दोनों मृतकों की अंतिम यात्रा को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ संपन्न कराया। जिन लोगों का इस दुनिया में कोई अपना नहीं था, उनके लिए शालू सैनी बेटी, बहन और वारिस की भूमिका में सामने आईं तथा श्मशान घाट पर सभी आवश्यक रस्में निभाईं।

दोनों शवों को नई मंडी श्मशान घाट लाया गया, जहां मौजूद लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं जब उन्होंने देखा कि जिन शवों को कोई अपना मानने वाला नहीं था, उनके लिए शालू सैनी स्वयं अर्थी को कंधा दे रही थीं, कफन की व्यवस्था कर रही थीं और पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर रही थीं।

मानवता को धर्म मानकर सेवा का संकल्प

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इस अवसर पर शालू सैनी ने कहा कि मृत्यु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक विदाई मिलना उसका मूल अधिकार है। उनका उद्देश्य केवल सेवा करना नहीं, बल्कि हर लावारिस और असहाय दिवंगत को गरिमापूर्ण अंतिम विदाई दिलाना है। उनका मानना है कि धर्म, जाति, रंग और पहचान से ऊपर मानवता सबसे बड़ा धर्म है।

स्थानीय लोगों ने शालू सैनी के इस मानवीय कार्य की सराहना करते हुए कहा कि वे पिछले कई वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के लावारिस, अज्ञात और असहाय मृतकों का अंतिम संस्कार कर रही हैं। मौसम चाहे कोई भी हो, सूचना मिलते ही वे सेवा के लिए पहुंच जाती हैं।

शालू सैनी इस कार्य को अपना कर्तव्य और साधना मानते हुए वर्षों से निभा रही हैं तथा समाज को मानवता, संवेदनशीलता और सेवा का प्रेरणादायक संदेश दे रही हैं।

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