कोहिमा/नई दिल्ली (शिखर समाचार) नागालैंड विधान सभा में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) भारत क्षेत्र जोन-III के 22वें वार्षिक सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि लोकतंत्र की गरिमा तभी बनी रह सकती है, जब विधायी संस्थान जिम्मेदारी और अनुशासन के साथ कार्य करें। उन्होंने कहा कि सुनियोजित ढंग से उत्पन्न किए जाने वाले व्यवधान न केवल लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करते हैं, बल्कि जनता को सार्थक बहस और जवाबदेही से भी दूर कर देते हैं। बिरला ने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे सदन की कार्यवाही के सुचारू संचालन में सहयोग करें, क्योंकि सुव्यवस्थित विधायी कार्यवाही ही प्रभावी शासन की नींव है।
बिरला का संदेश: लोकतंत्र तभी मजबूत जब विधानमंडल जनमत को नीतियों में बदले
बिरला ने कहा कि विधानमंडलों की भूमिका केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें जनमत को नीतियों का रूप देने में सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जनता की आवाज़ नीति निर्माण में परिलक्षित होती है, तभी लोकतंत्र सशक्त और जीवंत बनता है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि विधानमंडलों को ऐसी नीतियाँ तैयार करनी चाहिए जो पारदर्शी, जवाबदेह और जनहित में हों।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बिरला ने कहा कि भारत के अधिकांश विधानमंडल अब पेपरलेस प्रणाली अपनाकर डिजिटल शासन की दिशा में अग्रसर हैं। नागालैंड विधान सभा का पूरी तरह डिजिटल रूप में परिवर्तन उन्होंने अन्य राज्यों के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के नवाचार न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाते हैं बल्कि नागरिकों को नीति प्रक्रिया से सीधे जोड़ते हैं।
बिरला का चेतावनी संदेश: एआई का उपयोग लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए ही होना चाहिए
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रयोग पर चर्चा करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि तकनीक का उपयोग जिम्मेदारीपूर्वक और नैतिक तरीके से होना चाहिए। उन्होंने चेताया कि यदि इसका प्रयोग असावधानी से किया गया तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अवरोध बन सकता है। बिरला ने कहा कि एआई का उद्देश्य पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सशक्त करना होना चाहिए, न कि भ्रम या बाधा उत्पन्न करना।
केंद्र और राज्यों के संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सशक्त और सफल नीतियों के लिए दोनों के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है। संवैधानिक ढांचे में रहते हुए परस्पर सहयोग से ही जनहित में ठोस परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में इस सहयोग के चलते उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में सड़क, रेल और हवाई संपर्क समेत अवसंरचना विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
बिरला का दृष्टिकोण: उत्तर-पूर्वी राज्यों के सतत विकास के लिए जलवायु-संवेदनशील योजनाओं की आवश्यकता
उत्तर-पूर्वी राज्यों के समग्र विकास के लिए विशेष कार्य योजना की आवश्यकता पर बल देते हुए बिरला ने कहा कि इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु चुनौतियों को ध्यान में रखकर योजनाएँ तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास की नीतियों में जलवायु रेज़िलिएंस, हरित अवसंरचना और सामुदायिक भागीदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि यह क्षेत्र सतत विकास की दिशा में अग्रसर हो सके।
बिरला ने नागालैंड विधान सभा की पारदर्शी और जनोन्मुख कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि उत्तर-पूर्व के विधानमंडल स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप नीतियाँ बनाकर जवाबदेह शासन की दिशा में उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता, परंपराएँ और प्राकृतिक संसाधन इसे आत्मनिर्भर भारत के विज़न में महत्वपूर्ण भागीदार बनाते हैं।

सम्मेलन के समापन पर लोक सभा अध्यक्ष ने विश्वास व्यक्त किया कि नीति, प्रगति और जनता : परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में विधानमंडल विषय पर होने वाले विचार-विमर्श से उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास और लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मज़बूत करने के ठोस सुझाव प्राप्त होंगे। उन्होंने नागालैंड की गर्मजोशी भरे आतिथ्य की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन न केवल क्षेत्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि सामूहिक चिंतन और प्रगतिशील दृष्टिकोण को भी मजबूत बनाते हैं।
कार्यक्रम में नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश, नागालैंड विधान सभा अध्यक्ष शारिंगेन लोंगकुमेर और संसदीय कार्य मंत्री के.जी. केन्ये सहित आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में 12 पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया, जिनमें 7 विधान सभा अध्यक्ष और 5 उपाध्यक्ष सम्मिलित थे।
