अतीत को समझे बिना भविष्य का निर्माण संभव नहीं : हिंदू सभ्यता पर नई पुस्तक का लोकार्पण

Rashtriya Shikhar
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Building the future is not possible without understanding the past: Launch of a new book on Hindu civilization IMAGE CREDIT TO REPORTER

नई दिल्ली (शिखर समाचार)
इतिहास से प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, बल्कि उससे सीख लेकर आगे बढ़ा जा सकता है इसी मूल विचार के साथ लेखक शशि रंजन कुमार की नई पुस्तक हिंदू सभ्यता का पतन : अतीत से सीख का लोकार्पण राजधानी दिल्ली में आयोजित एक विचारपूर्ण कार्यक्रम में किया गया। यह आयोजन नई दिल्ली स्थित भारतीय अंतरराष्ट्रीय केंद्र के सभागार में संपन्न हुआ, जहाँ इतिहास, संस्कृति और बौद्धिक विमर्श से जुड़े अनेक विद्वान एकत्र हुए।

इतिहास की सच्चाई: शशि रंजन कुमार ने अतीत की उपलब्धियों और विफलताओं को अपनाने का संदेश दिया

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पुस्तक विमोचन के अवसर पर लेखक शशि रंजन कुमार ने कहा कि किसी भी सभ्यता के उत्थान और पतन को केवल भावनाओं या पूर्वाग्रहों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इतिहास का अध्ययन न तो केवल गौरवगाथा लिखने के लिए होना चाहिए और न ही आक्रोश व्यक्त करने के लिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अतीत की उपलब्धियों के साथ साथ उसकी विफलताओं को भी स्वीकार करना ही परिपक्व समाज की पहचान है।

यह पुस्तक चार प्रमुख खंडों उत्कर्ष, पतन, पराजय और कारण में विभाजित है। इन खंडों के माध्यम से लेखक ने हिंदू सभ्यता के सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास के साथ साथ उसके कमजोर पड़ने की प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण किया है। पुस्तक में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आंतरिक विघटन, रणनीतिक चूक और समय के साथ बदलती परिस्थितियों को न समझ पाना भी पतन के प्रमुख कारण रहे।

इतिहास का तथ्यपरक चित्रण: शशि रंजन कुमार ने प्राचीन और मध्यकालीन ग्रंथों के आधार पर सटीक अध्ययन प्रस्तुत किया

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लेखक ने बताया कि यह अध्ययन अनेक प्राचीन और मध्यकालीन ऐतिहासिक ग्रंथों पर आधारित है, जिनमें चचनामा, तबक़ात-ए-नासिरी, यामिनी ग्रंथ, फ़ुतूह अल बुलदान और अल-बिरूनी द्वारा रचित भारत संबंधी विवरण शामिल हैं। इन स्रोतों के आधार पर पुस्तक में घटनाओं को तुलनात्मक और तथ्यपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।

प्राचीन भारत की ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते हुए शशि रंजन कुमार ने कहा कि भारतीय गणित और विज्ञान की नींव अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद में संख्यात्मक अवधारणाओं के संकेत मिलते हैं, जबकि शून्य को स्वतंत्र संख्या के रूप में स्वीकार करना भारतीय बौद्धिक परंपरा की एक बड़ी उपलब्धि रही है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने बताया कि जटिल शल्य चिकित्सा और अंग-निर्माण जैसी विधियाँ भारत में बहुत पहले विकसित हो चुकी थीं, जो उस समय विश्व की अन्य सभ्यताओं के लिए असाधारण थीं।

युद्ध और कूटनीति का यथार्थ: शशि रंजन कुमार ने बताया कि रणनीति और नीति के बिना साहस भी अक्सर विफल रहता है

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पुस्तक के अंतिम हिस्से में लेखक ने युद्ध और शासन नीति पर भी गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि युद्ध केवल साहस का विषय नहीं होता, बल्कि उसमें रणनीति, कूटनीति और कभी कभी छल की भी भूमिका होती है। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित कूटनीतिक सिद्धांतों को भुला देना भारतीय शासकों की एक बड़ी ऐतिहासिक भूल सिद्ध हुई, जिससे बाहरी आक्रमणों का संगठित और प्रभावी प्रतिरोध नहीं हो सका।

इस अवसर पर स्वपन दासगुप्ता, गौतम सेन और अमिश त्रिपाठी जैसे वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी समाज के बौद्धिक पुनर्जागरण के लिए अतीत के साथ ईमानदार संवाद आवश्यक है। कार्यक्रम का संचालन चैतन्य के. प्रसाद ने किया। कुल मिलाकर यह पुस्तक इतिहास, पहचान और आत्मचिंतन से जुड़े प्रश्नों को नई दृष्टि से सामने रखती है। यह पाठकों को केवल अतीत में झाँकने के लिए नहीं, बल्कि उससे सीख लेकर वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तय करने के लिए प्रेरित करती है।

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