मुरादनगर (शिखर समाचार)।
ग्राम सरना में आयोजित नौ दिवसीय श्री राम कथा के अंतर्गत कथा व्यास दिनेश वशिष्ठ ने श्रीराम चरित के अत्यंत मार्मिक वनवास प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
वनवास प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन
कथा व्यास ने बताया कि अयोध्या में श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारियां पूरे उत्साह के साथ चल रही थीं, तभी दासी मंथरा के कुचक्र में आकर माता कैकई ने राजा दशरथ से पूर्व में दिए गए दो वरदान मांग लिए। इन वरदानों में श्री राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को अयोध्या का राज्य देने की मांग शामिल थी।
उन्होंने कहा कि यह सुनकर राजा दशरथ अत्यंत व्यथित हो उठे, लेकिन वचनबद्ध होने के कारण वे असहाय रहे। जब श्री राम को इस विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने पिता के वचनों की मर्यादा बनाए रखने के लिए सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया और माता कौशल्या को धैर्य बंधाया।
लक्ष्मण-उर्मिला का त्याग और समर्पण
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कथा के दौरान लक्ष्मण के त्याग और समर्पण का भी उल्लेख किया गया। श्री राम के वनगमन का समाचार मिलते ही लक्ष्मण उनके साथ चलने के लिए दृढ़ हो गए। इस बीच लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला के बीच अत्यंत भावुक संवाद हुआ।
उर्मिला ने साथ चलने की इच्छा जताई, लेकिन लक्ष्मण ने उन्हें अयोध्या में रहकर माताओं की सेवा करने को ही बड़ा धर्म बताया। इस पर उर्मिला ने त्याग और समर्पण का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने पति को श्री राम की सेवा के लिए समर्पित कर दिया और स्वयं विरह सहने का संकल्प लिया।
सीता का संकल्प और भावुक विदाई
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वहीं माता सीता ने भी पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए श्री राम के साथ वन जाने का निश्चय किया। माता कैकई द्वारा तीनों को वल्कल वस्त्र प्रदान किए गए। श्री राम और लक्ष्मण ने राजसी वस्त्र त्यागकर वल्कल धारण कर लिए। जब सीता को भी वल्कल दिए गए तो माता कौशल्या, गुरु वशिष्ठ और मंत्री सिद्धार्थ ने इसका विरोध किया। इस भावुक क्षण में श्री राम ने सीता को समझाते हुए राजसी वस्त्रों के ऊपर ही वल्कल धारण करने का आग्रह किया।
अंततः श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण वन के लिए प्रस्थान कर गए। इस प्रसंग का वर्णन सुनकर पूरा पंडाल ‘जय श्री राम’ के जयघोष से गूंज उठा और श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।
