अरणि गौड़
नई दिल्ली (शिखर समाचार)।
संघ लोक सेवा आयोग के सचिव शशि रंजन कुमार ने अपनी पुस्तक “हिंदू सभ्यता का पतन: अतीत से सीख” के माध्यम से भारतीय इतिहास के लगभग 5000 वर्षों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। इसी विषय पर आरनी गौर ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश
प्रश्न: आप विज्ञान और अभियांत्रिकी के छात्र रहे हैं, फिर इतिहास पर इतनी गंभीर पुस्तक लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर:
मैं भले ही विज्ञान का छात्र रहा हूँ, लेकिन इतिहास में मेरी रुचि शुरू से ही रही है। सिविल सेवा की तैयारी के दौरान मुझे इतिहास को गहराई से पढ़ने का अवसर मिला।
उस समय मैंने महसूस किया कि भारत के इतिहास को लेकर समाज में दो तरह के चरम विचार मौजूद हैं। एक वर्ग इसे पूरी तरह स्वर्णिम मानता है, जबकि दूसरा इसे अंधविश्वास और शोषण से जोड़कर देखता है।
इन्हीं विरोधाभासों के बीच मैंने तथ्यात्मक निष्कर्ष निकालने का निर्णय लिया, जिससे इस पुस्तक की शुरुआत हुई।
प्रश्न: आपने इस पुस्तक में किन विषयों को शामिल किया है और आपका शोध कितना व्यापक रहा?
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उत्तर:
इस पुस्तक में चार खंड और 16 अध्यायों के माध्यम से भारत के इतिहास को प्रस्तुत किया गया है।
पहले खंड में शिक्षा, खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, नाट्यशास्त्र, कामसूत्र, अर्थशास्त्र और भारतीय संस्कृति जैसे विषय शामिल हैं।
इसके साथ ही ग्रीस, रोम और चीन जैसी समकालीन सभ्यताओं से तुलना भी की गई है।
इस पुस्तक के लिए लगभग 350 से अधिक पुस्तकों और शोध पत्रों का संदर्भ लिया गया है।
प्रश्न: आपकी पुस्तक में भारत के पतन के प्रमुख कारण क्या बताए गए हैं?
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उत्तर:
तात्कालिक रूप से बाहरी आक्रमण एक बड़ा कारण रहे हैं, जिनमें हमारी ज्ञान परंपरा और संस्थाओं को नष्ट किया गया।
लेकिन असली कारण इससे कहीं अधिक गहरा है।
मेरे अनुसार सबसे बड़ा कारण हमारी रणनीतिक अंधता थी।
हम बाहरी दुनिया, उनकी रणनीतियों और उद्देश्यों को समझने में असफल रहे, जिसके कारण कम संख्या में आए आक्रमणकारी भी लंबे समय तक शासन कर सके।
प्रश्न: नालंदा जैसे ज्ञान केंद्रों के विनाश को आप कैसे देखते हैं?
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उत्तर:
मानव सभ्यता का विकास बौद्धिक विकास पर आधारित है।
जब तक ज्ञान का सृजन और प्रसार होता रहता है, तब तक सभ्यता आगे बढ़ती है।
लेकिन जब यह प्रक्रिया रुक जाती है या नष्ट हो जाती है, तब पतन शुरू हो जाता है।
नालंदा का विनाश केवल एक संस्थान का नहीं, बल्कि पूरी ज्ञान परंपरा के टूटने का प्रतीक था।
प्रश्न: “रणनीतिक अंधता” को थोड़ा विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
विदेशी यात्री जैसे मेगस्थनीज, ह्वेनसांग और मार्को पोलो भारत आए और यहाँ का विस्तृत वर्णन किया।
लेकिन भारत से बाहर जाकर अन्य देशों का अध्ययन करने की परंपरा विकसित नहीं हो सकी।
हम अपने संभावित शत्रुओं को समझ ही नहीं पाए, और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी रही।
प्रश्न: आपने “भारत” और “इंडिया” के अंतर की बात भी की है।
उत्तर:
“इंडिया” शब्द बाहरी लोगों द्वारा दिया गया नाम है, जो सिंधु नदी से निकला है।
जबकि “भारत” नाम हमारी अपनी पहचान और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।
इन दोनों शब्दों में भावनात्मक अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
प्रश्न: इतिहास से हमें क्या सीख लेनी चाहिए?
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उत्तर:
इतिहास से हमें गुस्सा या बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण है उससे सीख लेकर भविष्य में वही गलतियाँ न दोहराना।
हमें स्वयं को और अपने प्रतिद्वंद्वियों को समझना होगा।
जैसा कि प्रसिद्ध रणनीतिकार सुन त्ज़ू ने कहा है
यदि आप स्वयं को और अपने शत्रु को जानते हैं, तो आप कभी युद्ध नहीं हारेंगे।
प्रश्न: आपकी अगली पुस्तक किस विषय पर होगी?
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उत्तर:
अभी इसकी रूपरेखा तय नहीं है, लेकिन अगली पुस्तक इतिहास पर केंद्रित नहीं होगी।
अब मेरा ध्यान भविष्य पर है विशेषकर आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव पर।
प्रश्न: आपकी पुस्तक को अन्य इतिहास पुस्तकों से अलग क्या बनाता है?
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उत्तर:
अक्सर इतिहास की पुस्तकें किसी विचारधारा से प्रभावित होती हैं।
लेकिन मेरी कोशिश रही है कि यह पुस्तक पूरी तरह तथ्य और साक्ष्यों पर आधारित हो।
इसी कारण यह पुस्तक उन पाठकों के लिए भी उपयोगी है, जो पहली बार इतिहास को समझना चाहते हैं।
