प्रयागराज/गाजियाबाद (शिखर समाचार)
गाजियाबाद से जुड़े एक लंबे समय से विचाराधीन बैंक ऋण विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला आदेश पारित किया है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब पूरा ऋण चुका दिया गया हो और बैंक को किसी प्रकार की आर्थिक क्षति शेष न रह जाए, तब ऐसे मामलों में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय के उद्देश्य के विपरीत है। इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद के कोतवाली थाना क्षेत्र से संबंधित आपराधिक मुकदमे की समस्त कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
सशक्त दलीलों की जीत: न्यायालय में सच की निर्णायक दस्तक
यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव भारती की एकलपीठ द्वारा पारित किया गया। मामले में सोमदत्त शर्मा सहित अन्य आवेदकों की ओर से अधिवक्ता अपूर्व हजेला ने प्रभावशाली, तथ्यपरक और कानूनी दृष्टि से सशक्त दलीलें प्रस्तुत कीं। सुनवाई के दौरान उन्होंने न्यायालय के समक्ष पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि, बैंक द्वारा गठित जांच समिति की रिपोर्ट, प्रशासनिक निर्णय तथा ऋण की पूर्ण अदायगी से जुड़े सभी दस्तावेजों को क्रमबद्ध रूप से रखा। अधिवक्ता अपूर्व हजेला की इन्हीं ठोस और बेहतरीन दलीलों के परिणामस्वरूप न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह गया है।
प्रकरण के अनुसार वर्ष 2004 में गाजियाबाद अर्बन कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े एक ऋण मामले में कोतवाली थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जिसमें वर्ष 2004 में कोतवाली थाना, गाजियाबाद में अपराध संख्या 221एम/2004 के अंतर्गत भारतीय दंड संहिता की धारा 409 (आपराधिक न्यासभंग), 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 (जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) तथा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
फर्जीवाड़े के आरोप से समझौते तक: जांच में बदली पूरे मामले की तस्वीर
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आरोप था कि बैंक अधिकारियों से मिलीभगत कर कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे खाते खोले गए और ऋण स्वीकृत कराया गया था बाद भुगतान न होने से बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ। आरोप था कि कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से ऋण लिया गया और समय पर भुगतान न होने से बैंक को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। बाद में बैंक स्तर पर मामले की विस्तृत जांच कराई गई, जिसमें तथ्यों की गहन समीक्षा की गई। जांच रिपोर्ट के आधार पर बैंक प्रशासन ने मामले को आपसी सहमति से समाप्त करने का निर्णय लिया और न्यायालय में समझौते का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया।
अधिवक्ता अपूर्व हजेला ने न्यायालय को यह भी अवगत कराया कि अप्रैल 2012 में ऋण की पूरी राशि बैंक को वापस कर दी गई थी और इसके बाद बैंक के पास किसी प्रकार का बकाया शेष नहीं रहा। बैंक की ओर से प्रस्तुत पक्ष ने भी न्यायालय के समक्ष इन तथ्यों की पुष्टि की। इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि अब इस मामले में दोषसिद्धि की संभावना नगण्य है।
न्याय का अंतिम विराम: आपराधिक मुकदमे पर हाईकोर्ट की निर्णायक मुहर
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सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद की निचली अदालत में लंबित आपराधिक मुकदमे और उससे जुड़ी समस्त कार्यवाहियों को समाप्त करने का आदेश पारित किया। साथ ही, आदेश की प्रति संबंधित न्यायालय को भेजने के निर्देश भी दिए गए, ताकि शीघ्र अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
यह आदेश गाजियाबाद से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है और यह दर्शाता है कि प्रभावी पैरवी, ठोस तथ्यों और कानूनी मजबूती के साथ प्रस्तुत किए गए पक्ष से न्यायालय किस प्रकार संतुलित और न्यायोचित निर्णय तक पहुँचता है।
