इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अहम फैसला : 22 वर्ष पुराने आपराधिक मामले की कार्यवाही निरस्त

Rashtriya Shikhar
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Important ruling by the Allahabad High Court IMAGE CREDIT TO हाई कोर्ट प्रोफाइल फोटो

गाजियाबाद (शिखर समाचार)।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए लगभग 22 वर्ष पुराने आपराधिक मामले में चल रही समस्त कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ द्वारा पारित किया गया।

याचिका और आरोपों का संक्षिप्त विवरण

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प्रकरण में आलोक गोयल सहित चार अन्य आवेदकों ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 528 के अंतर्गत याचिका प्रस्तुत कर गाजियाबाद के कोतवाली थाना क्षेत्र से संबंधित अपराध संख्या 617/2004 में दर्ज मुकदमे की कार्यवाही समाप्त करने की मांग की थी।
उक्त मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468, 471 एवं 120-बी के तहत आरोप लगाए गए थे, जो कि वर्तमान में सिविल न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन), न्यायालय संख्या-5, गाजियाबाद में विचाराधीन था।

बैंक की जांच और अनापत्ति प्रमाण पत्र

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आवेदकों की ओर से अधिवक्ता अपूर्व हजेला ने न्यायालय में बताया कि आवेदक संबंधित बैंक में कार्यरत थे और चेक समाशोधन की प्रक्रिया के दौरान उनके विरुद्ध अनियमितता के आरोप लगाए गए थे। लेकिन बैंक द्वारा 23 अगस्त 2010 को कराई गई विभागीय जांच में किसी भी प्रकार की अनियमितता साबित नहीं हुई। इसके उपरांत बैंक ने आवेदकों और संबंधित ग्राहकों को अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान किया।

याचिका में यह भी बताया गया कि बैंक ने दिनांक 20 अप्रैल 2011 को एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर अपराधों के समझौते हेतु अनुरोध किया था, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि विभागीय जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और प्राथमिकी दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं था।

न्यायालय का निर्णय

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सभी परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने कहा कि जब विभागीय जांच में आरोप असत्य पाए गए हैं और संबंधित संस्था ने स्वयं अनापत्ति प्रदान की है, तो ऐसे में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना दुर्भावनापूर्ण अभियोजन की श्रेणी में आता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

इसी आधार पर न्यायालय ने विचाराधीन वाद संख्या 6464/2025 (राज्य बनाम हरिकेश एवं अन्य) और अपराध संख्या 617/2004 से संबंधित समस्त कार्यवाही, जिसमें 11 फरवरी 2006 का आरोप पत्र और 21 फरवरी 2006 का संज्ञान एवं समन आदेश शामिल हैं, को निरस्त कर दिया। न्यायालय के इस निर्णय से आवेदकों को बड़ी राहत मिली है और यह स्पष्ट संदेश गया है कि जब विभागीय जांच में आरोप असत्य सिद्ध हो जाएं, तो अनावश्यक रूप से आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।

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